सहारनपुर : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सहारनपुर में समाजवादी पार्टी के पूर्व एमएलसी और पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजपाल कश्यप का दौरा इसी बढ़ती राजनीतिक सक्रियता की कड़ी के तौर पर सामने आया। अंबाला रोड स्थित सपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राजपाल कश्यप ने आरक्षण, रोजगार, पेपर लीक, सरकारी भर्तियों, किसानों, गन्ना भुगतान और कानून-व्यवस्था समेत कई मुद्दों को उठाया।
उनके संबोधन में भाजपा सरकार पर लगाए गए आरोपों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी की PDA रणनीति की झलक भी दिखाई दी। सपा पिछले कुछ समय से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को केंद्र में रखकर संगठनात्मक कार्यक्रम कर रही है। सितंबर में पार्टी की PDA जनपंचायतों में भी सामाजिक भागीदारी और अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे।
आरक्षण और सामाजिक भागीदारी पर फोकस
राजपाल कश्यप ने अपने संबोधन में कश्यप, निषाद, बिंद, धीमर, मल्लाह, कहार, माझी, मझवार, तुरहा, भर, राजभर और प्रजापति समेत 17 जातियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि पिछली सपा सरकार के दौरान इन जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी, लेकिन बाद में इसे आगे नहीं बढ़ाया गया।
यह मुद्दा पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई अति-पिछड़े समुदायों के बीच राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। सपा इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण के सवाल से जोड़कर उठा रही है। राजपाल कश्यप ने कहा कि PDA समाज को अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने की जरूरत है। उन्होंने भाजपा के सहयोगी दलों से जुड़े नेताओं अनिल राजभर, संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल का नाम लेते हुए भी सवाल उठाए।
उनका कहना था कि यदि ये नेता अपने-अपने सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उन्हें आरक्षण और सामाजिक अधिकारों के मुद्दे पर सरकार के सामने अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। राजपाल कश्यप ने इन नेताओं पर सपा और अखिलेश यादव के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी करने का आरोप लगाया और इसी क्रम में तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। हालांकि उनके इन आरोपों पर कार्यक्रम के दौरान भाजपा की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
रोजगार और पेपर लीक को बनाया बड़ा मुद्दा
सपा नेता ने युवाओं से जुड़े सवालों को भी अपने भाषण का प्रमुख हिस्सा बनाया। उन्होंने पेपर लीक, सरकारी भर्तियों, आउटसोर्सिंग, संविदा नौकरियों और अग्निवीर योजना को लेकर सरकार पर निशाना साधा। राजपाल कश्यप ने ई-रिक्शा को रोजगार के विकल्प के तौर पर पेश किए जाने वाले तर्क पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि इसे इतना बेहतर रोजगार माना जा रहा है तो मंत्री और उनके परिवार के लोग भी इसे अपनाएं।
यह मुद्दा सीधे उन युवाओं से जुड़ता है जो प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों की तैयारी कर रहे हैं। सपा के लिए PDA की राजनीति में रोजगार को जोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जातीय-सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को युवाओं की रोजमर्रा की आर्थिक चिंताओं से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
किसानों और गन्ना भुगतान पर भी सरकार को घेरा
सहारनपुर और पश्चिमी यूपी की राजनीति में किसान और गन्ना भुगतान लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। राजपाल कश्यप ने गन्ने के भुगतान को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने सरकार के 14 दिन में गन्ना भुगतान के दावे का जिक्र करते हुए बकाया भुगतान को मुद्दा बनाया।
साथ ही उन्होंने कहा कि सत्ता में आने पर अखिलेश यादव किसानों को 24 घंटे में गन्ने का भुगतान और लाभकारी मूल्य देने का वादा कर चुके हैं। इस तरह सपा के मौजूदा राजनीतिक अभियान में PDA के सामाजिक समीकरण के साथ किसान और रोजगार जैसे मुद्दों को भी जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल किसी एक सामाजिक वर्ग के सवाल तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग वर्गों के मुद्दों को एक राजनीतिक मंच पर लाना है।
भाजपा भी पश्चिमी यूपी में सक्रिय
सहारनपुर में राजपाल कश्यप का कार्यक्रम ऐसे समय हुआ है जब भाजपा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियां तेज कर चुकी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने 21 और 22 सितंबर को मेरठ और सहारनपुर का दौरा किया था। सहारनपुर में उन्होंने पूर्व जनप्रतिनिधियों और मौजूदा पदाधिकारियों के साथ संगठन तथा 2027 की तैयारियों पर चर्चा की।
उनके दौरे में संगठनात्मक बैठकों के साथ सामाजिक संपर्क कार्यक्रम भी शामिल रहे। सहारनपुर में भाजपा अध्यक्ष ने रविदास मंदिर में दर्शन किया और एक दलित कार्यकर्ता के घर भोजन किया। पार्टी की ओर से इन कार्यक्रमों को संगठन और सामाजिक संपर्क से जोड़ा गया।
इससे पश्चिमी यूपी में 2027 को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक गतिविधियां दिखाई देती हैं। सपा PDA पंचायतों और सामाजिक भागीदारी से जुड़े मुद्दों के जरिए कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों को जोड़ने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा संगठनात्मक बैठकों, बूथ स्तर की तैयारी और सामाजिक संपर्क कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
2024 के बाद बदला राजनीतिक संदर्भ
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2024 का लोकसभा चुनाव भी 2027 की राजनीतिक चर्चाओं का एक संदर्भ बना हुआ है। सहारनपुर क्षेत्र में विपक्षी दलों के प्रदर्शन ने राजनीतिक दलों को अपने सामाजिक और संगठनात्मक समीकरणों पर दोबारा विचार करने का आधार दिया है।
हालांकि लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं माना जा सकता। दोनों चुनावों में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, गठबंधन, मुद्दे और मतदान व्यवहार अलग हो सकते हैं। इसलिए 2024 के प्रदर्शन को 2027 का पूर्वानुमान मानने के बजाय उस समय के राजनीतिक माहौल का एक संकेतक भर माना जाना चाहिए।
सीट बंटवारे पर फैसला अखिलेश यादव करेंगे
2027 के चुनाव में सीट बंटवारे और संभावित गठबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर राजपाल कश्यप ने कहा कि अंतिम फैसला सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव करेंगे। उन्होंने कहा कि लड़ाई किसी एक व्यक्ति के टिकट की नहीं, बल्कि भाजपा को सत्ता से हटाने की है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि उनकी सीट छोड़ने से भाजपा को हराने में मदद मिलती है तो वह सीट छोड़ने के लिए भी तैयार हैं।
यह बयान विपक्षी एकजुटता के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे 2027 के गठबंधन या सीट बंटवारे का अंतिम स्वरूप तय नहीं माना जा सकता। फिलहाल अलग-अलग दलों की रणनीति और बातचीत आने वाले महीनों में बदल सकती है।
PDA से संगठन तक पहुंचने की चुनौती
राजपाल कश्यप के सहारनपुर दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि PDA को केवल चुनावी नारे के बजाय संगठनात्मक अभियान के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई दी। सपा के PDA कार्यक्रमों में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के साथ सामाजिक अधिकार, प्रतिनिधित्व और रोजगार के मुद्दे उठाए जा रहे हैं। हाल के कार्यक्रमों में राजपाल कश्यप ने PDA को 2027 की चुनावी रणनीति से जोड़ा है।
वहीं भाजपा की ओर से पश्चिमी यूपी में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने का सिलसिला भी जारी है। नितिन नबीन के सहारनपुर दौरे में बूथ और संगठन की तैयारियों पर चर्चा हुई थी। ऐसे में सहारनपुर में राजनीतिक बहस अब केवल नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं रहने वाली है। आरक्षण, रोजगार, किसान, गन्ना भुगतान, सामाजिक प्रतिनिधित्व, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक संवाद का हिस्सा बने रह सकते हैं।
फिलहाल राजपाल कश्यप का सहारनपुर दौरा 2027 के चुनाव परिणाम का संकेत नहीं है, लेकिन यह समाजवादी पार्टी की मौजूदा रणनीति का एक स्पष्ट उदाहरण जरूर है। PDA के सामाजिक समीकरण को रोजगार और किसान जैसे व्यापक मुद्दों से जोड़कर सपा पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर भाजपा संगठनात्मक ढांचे और जमीनी नेटवर्क को सक्रिय करने में जुटी है।
अब आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये राजनीतिक अभियान किस तरह बूथ स्तर तक पहुंचते हैं, स्थानीय नेताओं और उम्मीदवारों की भूमिका क्या रहती है तथा मतदाताओं के बीच कौन से मुद्दे सबसे अधिक महत्वपूर्ण बनते हैं।

